Bhagavad Gita Adhyay 15 Purushottam Yog | Main Bhi Arjun: Vacha | Bhagavad Gita Ambassador | Best 20 Sanskrit Sloka Chapter 15
CREDITS
| Credit | Name |
|---|---|
| Album\Movie | Main Bhi Arjun: Vacha |
| Lyricist | Traditional |
| Music Director | Dr. Krupesh Thacker |
| Singer | Vacha Thacker, Parv Thacker |
| Producer | Nayna Thacker, Dr. Shashikant Thacker, Dr. Pooja Thacker |
| Music Label | Krup Music |
| NGO Partner | Give Vacha |
| Branding Partner | Esy ID, The Krup Universe, Hindi Mijaaj |
| Event Partner | Sur Gujarat Ke, Nach Le, The Global Gujarat Show, Sur Hindustan Ke |
| Talent Partner | KM Talent Management |
| Contest Partner | Krup Talent Hunt |
| Academy Partner | Krup Academy |
| Publisher | Krup Publishing |
| Recording Studio | Krup Music Studios |
| Production Companies | Krup Productions (KM Productions), Krup Films |
| Esy ID Link | Bhagavad Gita Adhyay 15 Purushottam Yog (Kids Version) |
ABOUT
“Bhagavad Gita Adhyay 15 Purushottam Yog” by Vacha Thacker, Parv Thacker & Dr. Krupesh Thacker (Parv Fusion Band). It is from the Hindi films ‘Main Bhi Arjun: Vacha‘, 2nd film of ‘Main Bhi Arjun Universe‘ movie series. The movie is produced by Nayna Thacker, Dr. Shashikant Thacker & Dr. Pooja Thacker. The song is released by Krup Music Record Label. Give Vacha Foundation is the NGO partner.
SANSKRIT LYRICS
श्रीभगवानुवाच |
ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् |
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् || 1||
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवाला: |
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके || 2||
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा |
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा || 3||
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय: |
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी || 4||
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा: |
द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञै
र्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत् || 5||
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक: |
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम || 6||
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: |
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति || 7||
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वर: |
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् || 8||
श्रोत्रं चक्षु: स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च |
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते || 9||
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् |
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: || 10||
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् |
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस: || 11||
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् |
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् || 12 ||
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा |
पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक: || 13||
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित: |
प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम् || 14||
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च |
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् || 15||
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च |
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते || 16||
उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत: |
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर: || 17||
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तम: |
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरुषोत्तम: || 18||
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् |
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत || 19||
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ |
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत || 20||